चित्रकूट में नौजवान भारत सभा की ओर से महान जाति विरोधी योद्धा और स्त्री मुक्ति के नायक ज्योतिबा फुले के स्मृति दिवस (28 नवम्बर) पर आज महात्मा ज्योतिबाराव फुले इण्टर कॉलेज, रामनगर-चित्रकूट में उनके जीवन, संघर्षों और आज के समय में ज्योतिबा फुले के विचारों की प्रासंगिकता पर बातचीत की गयी और इससे सम्बंधित पोस्टर प्रदर्शनी लगाई गयी.
कार्यक्रम की शुरुआत ज्योतिबाराव फुले की प्रतिमा पर माल्याणपड़ से हुई। इस दौरान नौभास के कार्यकर्ताओं ने ज्योतिबाराव अमर रहे जैसे गगनभेदी नारों और क्रान्तिकारी गीत ‘लड़ाई जारी है’ पेश किया।
नौजवान भारत सभा के केन्द्रीय परिषद सदस्य प्रसेन ने ज्योतिबा राव फुले की जीवन पर बात रखते हुए बताया कि 11 अप्रैल 1827 को पैदा होने वाले ज्योतिबा फुले ने आज से डेढ़ शताब्दी पहले ब्राह्मणवादी ताकतों से वैर मोल लेकर पुणे के भिडे वाडा में लड़कियों के लिए स्कूल खोला था। जब लड़कियों को पढ़ाने के लिए अध्यापिका नहीं मिली तो ज्योतिबा फुले ने सावित्रीबाई फुले को पढ़ाकर इस योग्य बना दिया कि वे खुद पढ़ा सकें। इस घटना का एक क्रांतिकारी महत्व है। पीढ़ी दर पीढ़ी दलितों पर अनेक प्रतिबन्धों के साथ ही “शिक्षाबन्दी” के प्रतिबन्ध ने भी दलितों व स्त्रियों का बहुत नुकसान किया था। ज्योतिबा व सावित्रीबाई ने इसी कारण वंचितों की शिक्षा के लिए गम्भीर प्रयास शुरू किये। इस संघर्ष के दौरान उन पर पत्थर, गोबर, मिट्टी तक फेंके गये और उनके माता-पिता पर दबाव बनाकर उन्हें घर से निकलवा दिया गया पर उन्होंने शिक्षा का यह महत्व्पूर्ण कार्य बिना रुके किया और जल्द ही एक के बाद एक तीन स्कूल खोल डाले। इस काम में इनका साथ दिया फ़ातिमा शेख ने।
ज्योतिबा फुले ने सत्यशोधक समाज की स्थापना की थी। वे बाल विवाह के विरोधी और विधवा विवाह के प्रबल समर्थक थे। 28 नवम्बर 1890 ज्योतिबा फुले की मृत्यु हो गयी।
संचालन कर रहे नौभास-चित्रकूट इकाई के प्रभारी रवि ने कहा कि ज्योतिबा और सावित्रीबाई के समय में ज्यादातर गरीब शिक्षा से वंचित थे और दलित उससे अतिवंचित थे। आज शिक्षा का पहले के मुकाबले ज्यादा है और दलित उसमें भी अतिवंचित हैं।1991 की निजीकरण, उदारीकरण की नीतियों के बाद तो उसे पूरी तरह बाजार में लाकर छोड़ दिया है। हाल ही में पेश की गयी नयी शिक्षा नीति इस मामले में अब तक के सभी काले-कानूनों से चार क़दम आगे है। सरकारी स्कूालों की दुर्वस्था व निजी स्कूलों व विश्व विद्यालयों के मनमाने नियमों व अत्यूधिक आर्थिक शोषण के कारण पहले ही दूर रही शिक्षा सामान्य गरीबों की क्षमता से बाहर चली गयी है। आज एक आम इंसान अपने बच्चों को डॉक्टर या इंजीनियर बनाना तो सपने में भी नहीं सोच सकता। आज एक बार फिर से गरीबों व विशेषकर दलितों व अन्य वंचित तबकों से आने वालों पर नयी शिक्षाबन्दी लागू हो गयी है।
आज ज्योतिबाफुले को याद करते हुए हमें ये विचार करना होगा कि उनके शुरू किये संघर्ष का आज क्या हुआ? नयी शिक्षाबन्दी को तोड़ने के लिए सभी गरीबों-मेहनतकशों की एकजुटता का आह्वान कर सबके लिए नि:शुल्क शिक्षा का संघर्ष हमें आगे बढ़ाना होगा।
कार्यक्रम की अध्यक्षता महात्मा ज्योतिबाराव फुले इण्टर कॉलेज के प्रधानाचार्य पुरुषोत्तम दास ने किया।
कार्यक्रम में कौशल, अभिषेक, रजनीश, राहुल, रामसलोने, रवि, मनु, अंशुरीश, प्रांजल अविनाश और सैकड़ों छात्र शामिल रहेआदि शामिल हुए।
रिपोर्ट सूरज श्रीवास्तव
मो.9519249671







