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हिंदू नव वर्ष के पहले दिन जानिए पंचांग, नवरत्न और सिंहासन बत्तीसी की कहानी

sampurantoday by sampurantoday
March 23, 2023
in मध्य प्रदेश
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हिंदू नव वर्ष के पहले दिन जानिए पंचांग, नवरत्न और सिंहासन बत्तीसी की कहानी
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आज गुड़ी पड़वा है। यानी हिंदू नव वर्ष का पहला दिन। हिंदू नव वर्ष के कैलेंडर की शुरुआत MP के ही उज्जैन शहर से हुई। इस कैलेंडर को विक्रम कैलेंडर भी कहा जाता है। उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य ने विक्रम संवत की शुरुआत की थी, तभी से इस कैलेंडर के अनुसार हिंदू नव वर्ष मनाया जाता है।

हाल ही में तेलुगु में ‘विक्रम’ नाम से फिल्म आई और फिर ‘विक्रम वेधा’ नाम से हिंदी में रीमेक हुआ। इसमें विक्रम-बेताल की थीम स्टोरी को ही अलग रूप से पेश किया गया है। विक्रमादित्य कौन थे और उज्जैन से कैसे ये सफर शुरू हुआ? इस तरह के कई सवालों के जवाब से जुड़े दस्तावेज उज्जैन के विक्रमादित्य शोध पीठ में मौजूद हैं।

चैत्र शुक्ल एकम को 1 अरब 95 करोड़ 58 लाख 81 हजार 124 वर्ष हुए

गुड़ी पड़वा का दिन सृष्टि का आरंभ दिन माना गया है। अरबों वर्ष पुराना दिन है। चैत्र शुक्ल एकम सबसे पुराना दिन है। जिस रोज सृष्टि की उत्पत्ति हुई, वही दिन काल गणना का पहला दिन हुआ। अब चैत्र शुक्ल एकम को 1 अरब 95 करोड़ 58 लाख 81 हजार 124 वर्ष हो गए।

विक्रमादित्य का जन्म 102 ईसा पूर्व हुआ था। उन्होंने 57 ईसा पूर्व भारत से शक साम्राज्य का पतन किया। शकों को हराने के बाद उन्होंने उनके कैलेंडर शक संवत की जगह इसी साल से विक्रम संवत शुरू किया। इसे आगे चलकर हिंदू कैलेंडर कहा गया। 2080 वर्ष पहले विक्रम संवत शुरू हुआ, जब राजा विक्रमादित्य उज्जैन के राजा थे। दुनिया भर में 60 से अधिक संवत हुए, लेकिन विक्रम संवत सबसे ज्यादा प्रचलित है।

हालांकि, भारत में आज भी अंग्रेजी कैलेंडर से ही काल की गणना की जा रही है। राजा विक्रमादित्य के समय में सबसे बड़े खगोल शास्त्री वराह मिहिर थे। उनकी सहायता से इस संवत के प्रसार में मदद मिली। विक्रम संवत अंग्रेजी कैलेंडर से 57 वर्ष आगे है। अंग्रेजी कैलेंडर में वर्ष 2023 चल रहा है, जबकि 22 मार्च से विक्रम संवत 2080 शुरू हो गया। हिंदू कैलेंडर का पहला महीना चैत्र और आखिरी महीना फाल्गुन होता है।

साम्राज्य ऐसा कि न इससे पहले हुआ, न इसके बाद

न भूतो, न भविष्यति। यानी न अतीत में हुआ और न भविष्य में होने की संभावना है। इस वाक्य को चरितार्थ किया विक्रमादित्य ने। विक्रमादित्य का नाम दो शब्दों के समास से बना था। विक्रम और आदित्य। अपने नाम के ही अनुसार जब विक्रम यानी पराक्रम का सूर्य चमका तो सब देखते रह गए। विक्रमादित्य ने संपूर्ण एशिया को जीत लिया था। उस समय उनका साम्राज्य आधुनिक चीन, मध्य एशिया और दक्षिण पूर्वी एशिया के कुछ भाग तक फैला हुआ था, जो अभी तक के इतिहास का सबसे बड़ा साम्राज्य है। इसके बाद भारत का कोई भी शासक इतने बड़े साम्राज्य का अधिपति कभी नहीं रहा।

विक्रमादित्य के नौ रत्न, सब एक से बढ़कर एक

महाराज विक्रमादित्य ने अपनी सभा में नवरत्नों को रखने का प्रचलन शुरू किया था। उनको देखकर बाद में अन्य शासकों ने भी नवरत्न रखे। ये प्रचलन सदियों तक चला। 16वीं सदी में अकबर के दरबार के नौ रत्न भी विख्यात हुए। विक्रमादित्य के नवरत्न धनवंतरि, क्षणपक, अमर सिंह, कालिदास, बेताल भट्ट, शंकु, वररुचि, घटकर्पर और वराह मिहिर थे। ये सभी नवरत्न अपनी विधा में माहिर थे। धनवंतरि आयुर्वेद के ज्ञाता थे, तो क्षणपक जैन संत और धर्म के मर्मज्ञ। अमर सिंह के शब्दकोश अमरकोश को पढ़ने भर से ही व्यक्ति को बड़ा ज्ञानी मान लिया जाता रहा। शंकु नीतिज्ञ थे तो बेताल भट्‌ट धर्माचार्य। वररुचि कवि और घटकपर्र संस्कृत विशेषज्ञ थे। वराह मिहिर महान ज्योतिषी थे। कालीदास के महाकाव्य युग साहित्य बन गए।

शनि के साथ संघर्ष की कहानी

विक्रमादित्य और शनि से संबंधित एक कथा कर्नाटक के यक्षगान में प्रस्तुत की जाती है। इसमें विक्रमादित्य से नाराज होकर शनि ने उनकी तरह-तरह से परीक्षा ली। तमाम कष्टों के बीच भी संघर्ष नहीं छोड़ने और हर परीक्षा में सफल होने पर शनि प्रसन्न हुए। विक्रमादित्य ने उनसे वरदान प्राप्त किया कि मैंने तो कष्ट सह लिए, लेकिन आम आदमी आपके इतने कोप को सहन नहीं कर सकेगा, इसलिए उस पर कृपा कीजिएगा। किवदंती है कि शनि ने तथास्तु कहा।

श्रीराम जन्मभूमि पर बनवाया था विशाल मंदिर

ईसा के लगभग 100 वर्ष पूर्व उज्जैन के चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य एक दिन आखेट करते हुए अयोध्या पहुंच गए। उन्हें इस भूमि में कुछ चमत्कार दिखाई देने लगे। तब उन्होंने खोज आरंभ की और पास के योगी व संतों से उन्हें ज्ञात हुआ कि यह श्रीराम की अवध भूमि है। उन संतों के निर्देश से सम्राट ने यहां एक भव्य मंदिर के साथ ही कूप, सरोवर, महल आदि बनवाए। कहते हैं कि उन्होंने श्रीराम जन्मभूमि पर काले रंग के कसौटी पत्थर वाले 84 स्तंभों पर विशाल मंदिर का निर्माण करवाया था। इस मंदिर की भव्यता और शोभा देखते ही बनती थी।

बेताल पचीसी और सिंहासन बत्तीसी की कहानी

बेताल पचीसी यानी वो पचीस कहानियां, जो बेताल ने विक्रमादित्य को सुनाईं और उनकी न्यायप्रियता की परीक्षा ली। ये कहानियां कब लिखी गईं? इसका ठीक-ठीक अनुमान लगाना मुश्किल है, लेकिन किवदंती है कि ये कहानियां विक्रमादित्य के शासनकाल के दौरान ही लिखी गईं। इस कहानी में विक्रमादित्य एक साधु के कहने पर श्मशान से बेताल काे एक पेड़ से उतारकर रात में साधु के तांत्रिक अनुष्ठान स्थल पर ले जाते हैं। रास्ते में बेताल उन्हें हर रात एक कहानी इस शर्त पर सुनाता है कि उन्हें रास्ते में कुछ बोलना नहीं है, लेकिन न्याय करना है। विक्रमादित्य अपनी न्यायप्रियता के लिए विख्यात थे। हर कहानी पर न्याय करने के दौरान विक्रम को बोलना पड़ता और बेताल फिर से पेड़ पर चला जाता।

सिंहासन बत्तीसी के बारे में किवदंती है कि जिस सिंहासन पर विक्रमादित्य बैठते थे, उसमें 32 पुतलियां यानी मुख थे। इसी कुर्सी पर बैठकर वो न्याय करते थे। ये सभी 32 मुख उन्हें न्याय करने में सहायता करते थे। ये सिंहासन कालांतर में गायब हो गया। सदियों बाद राजा भोज ने खोज कराकर इस सिंहासन को हासिल किया। जब वो इस सिंहासन पर बैठने लगे तो सारी पुतलियां हंस पड़ीं और हर पुतली ने अपने-अपने मुख से विक्रमादित्य के गुणों का बखान किया। यही सिंहासन बत्तीसी कहानी की आधार पृष्ठभूमि है।

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